Narmada Manav

अगले वित्त वर्ष में सरकार पहले दो बैंकों का निजीकरण कर सकती है, लेकिन सरकार नहीं चाहती कि किसान आंदोलन की तरह ही बैंकों के निजीकरण के मुद्दे पर भी कोई नया आंदोलन खड़ा हो जाए। 

नई दिल्ली। खबर है कि सरकार ने उन चार सरकारी बैंकों के नाम फाइनल कर लिए हैं, जिन्हें सबसे पहले प्राइवेट सेक्टर को बेचा जा सकता है। अब तक सामने आई जानकारी के मुताबिक जिन चार बैंकों को शुरुआती दौर में निजीकरण के लिए चुना गया है, वे हैं – बैंक ऑफ महाराष्ट्र (Bank of Maharashtra), बैंक ऑफ इंडिया (Bank of India- BOI), इंडियन ओवरसीज बैंक (Indian Overseas Bank) और सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया (Central Bank of India)। हालांकि इन नामों की औपचारिक घोषणा अब तक नहीं की गई है।

जानकारों का मानना है कि किसान आंदोलन के दौरान पनपे भारी जनाक्रोश को देखते हुए सरकार बैंकों के निजीकरण के मामले में फूंक फूंक कर कदम रखना चाहती है। सरकार नहीं चाहती कि उसे बैंकों के निजीकरण के दौरान भी लोगों की वैसी ही नाराज़गी का सामना करना पड़े, जैसी कृषि कानूनों के विरोध में देखने को मिली है। 

संभावित जनाक्रोश को देखते हुए सरकार इस समय किसी भी तरह के खतरे को मोल लेने के मूड में नहीं है। लिहाज़ा सरकार चरणबद्ध ढंग से एक योजना के तहत बैंकों का निजीकरण करने की सोच रही है। अगले वित्त वर्ष सरकार पहले दो बैंकों का निजीकरण करने वाली है। इसमें सबसे पहले सरकार बैंक ऑफ महाराष्ट्र का निजीकरण करेगी। इसके पीछे की वजह यह है कि चूंकि बैंक ऑफ महाराष्ट्र में दूसरे बैंकों की तुलना में कम कर्मचारी काम करते हैं, लिहाज़ा सरकार यह सोच रही है कि उसे एक साथ बड़ा विरोध न झेलना पड़े। 

बैंकों के निजीकरण के विरोध की आशंका क्यों है  

बैंकों के निजीकरण से उन बैंको में काम करने वाले कर्मचारियों के रोज़गार के हालात में बदलाव हो सकते हैं। बैंकों का प्राइवेट मैनेजमेंट कर्मचारियों की संख्या घटाने का फैसला भी कर सकता है। अगर ऐसा हुआ तो बहुत से बैंक कर्मचारियों का रोज़गार खतरे में पड़ सकता है। यही वजह है कि सरकार कर्मचारियों के व्यापक विरोध को देखते हुए एक तय योजना के अनुसार निजीकरण की प्रक्रिया को अपनाने का विचार कर रही है। चारों बैंकों में लगभग सवा लाख कर्मचारी काम करते हैं। बैंक ऑफ इंडिया में 50 हज़ार, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में 33 हज़ार, इंडियन ओवरसीज बैंक में 26 हज़ार जबकि बैंक ऑफ महाराष्ट्र में सबसे कम 13 हज़ार कर्मचारी काम करते हैं।इसलिए सरकार ने निजीकरण का पहला प्रयोग बैंक ऑफ महाराष्ट्र के साथ करने का मन बनाया है। 

बैंकों के निजीकरण से उनके पुराने ग्राहक भी बिदक सकते हैं, क्योंकि आम तौर पर सरकारी बैंकों में खाता रखने वाले ग्राहक उन्हें निजी बैंकों के मुकाबले ज्यादा सुरक्षित मानते हैं। पिछले कुछ वर्षों में यस बैंक समेत कई निजी और कोऑपरेटिव बैंकों के संकटग्रस्त होने की घटनाओं से लोगों की आशंकाएं और बढ़ी हैं। ऐसे में हो सकता है कि ग्राहक भी अपने बैंकों का निजीकरण किए जाने को पसंद न करें। बैंकों के निजी मैनेजमेंट कम बिजनेस देने वाली शाखाओं को बंद करने का फैसला भी कर सकते हैं। इससे उन शाखाओं के पास रहने वाले ग्राहकों को बैंकिंग सेवाएं हासिल करने में मुश्किल हो सकती है। खासतौर पर उन ग्राहकों के लिए जो नेटबैंकिंग या फोनबैंकिंग जैसी आधुनिक सुविधाएं इस्तेमाल करने के अभ्यस्त नहीं हैं, बैंकों का निजीकरण शुरुआती तौर पर नई परेशानियां खड़ी कर सकता है।

इसके अलावा सरकारी बैंक कई सरकारी योजनाओं पर अमल करने और प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रों को आसान शर्तों पर कर्ज देने जैसे काम भी करते हैं। निजीकरण के बाद उनकी इस भूमिका में भी बदलाव हो सकता है। सरकार बैंकों का निजीकरण इसलिए करना चाहती है, ताकि वो इन्हें बेचकर 1.75 लाख करोड़ रुपये जुटाने का अपना विनिवेश का लक्ष्य हासिल कर सके।

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