Narmada Manav

बच्चों के सर्वांगीण और गुणात्मक विकास की दिशा में सार्थक कदमहोषंगाबाद। राष्ट्रीय स्तर लेकर स्थानीय स्तर तक यह बात लंबे समय उठाई जाती रही है छोटे बच्चों के बस्ते का वजन बहुत अधिक है, इसे कम होना चाहिए। इस संबंध में समेरिटंस स्कूल प्रबंधन द्वारा काफी समय से अध्ययन और विचार मंथन किया जा रहा था। लंबे विचार-विमर्श के बाद स्कूल प्रबंधन ने छोटे बच्चों के बस्ते का वजन कम करने का निर्णय किया है। उनका बोझ बहुत ही कम कर दिया गया है। इससे बच्चे और अभिभावक तनाव मुक्त होंगे। बच्चे भी बिना किसी मानसिक तनाव और अनावश्यक शारीरिक श्रम के बेहतर तरीके से अध्ययन कर सकेंगे। साथ ही उनके अध्ययन का ऐसा चार्ट तैयार किया गया है कि इससे बच्चों का सर्वांगीण और गुणात्मक विकास भी होगा और वे वर्तमान समय में प्रतिस्पर्धा में भी नहीं पिछडेंगे।
इस संबंध में समेरिटंस गु्रप आॅफ स्कूल्स के डायरेक्टर और प्राचार्य डाॅ आशुतोष कुमार शर्मा ने बताया कि बच्चों की शिक्षण पद्धति और शिक्षण कौशल में वृद्धि के साथ ही उनके सर्वांगीण विकास के लिए विद्यालय प्रबंधन द्वारा लगातार प्रयास किया जाता रहा है। इसी प्रयास के बाद यह निर्णय किया गया है। कक्षा प्रथम से कक्षा पांचवीं तक के बच्चों के बस्ते का बोझ कम किया गया है। इस संबंध में अभी अभिभावकों और शिक्षाविदों से विचार-विमर्श की प्रक्रिया जारी है। शिक्षा क्षेत्र से जुडे सभी पक्षों से सुझाव भी लिए जा रहे हैं। यदि जरूरी हुआ तो इसमें और सुधार भी किया जा सकता है।
अभी ये किया परिवर्तन
अभी तक बच्चे पूरा बस्ता लेकर स्कूल आते हैं। इस बस्ते में लगभग आधा दर्जन पुस्तकें और कापी होती हैं। साथ ही उसका टिफिन और पानी की बाॅटल भी होती है। इसका वजन बच्चे की उम्र और उसकी शारीरिक क्षमता के हिसाब से काफी ज्यादा होता था। परिवर्तन के बाद इसे एकदम हल्का कर दिया गया है। अब बच्चा बस्ते में केवल दो पुस्तक और दो कापी ही लेकर आएगा। यानी वह दिन में केवल दो विषय ही पढेगा। दूसरे दिन दूसरे दो विषय पढेगा। बच्चों को दिए जाने वाले होमवर्क को भी कम किया जा रहा है। बच्चों के मानसिक विकास के लिए यह जरूरी है कि बच्चा अधिक से अधिक समय प्रकृति के बीच गुजारे और सीखे।
काफी लंबी प्रक्रिया के बाद किया निर्णय
इस संबंध में डा शर्मा ने बताया कि इस परिवर्तन के पहले हमारे द्वारा काफी विचार-मंथन किया गया। इस बारे में प्रदेश और देश के जाने-माने शिक्षाशास्त्रियों से चर्चा की गई। अन्य देशों की शिक्षा पद्वतियों विशेषकर प्री प्राइमरी और प्राइमरी शिक्षा पद्वतियों का भी अध्ययन किया गया। इसके अलावा मीडिया जगत के लोगों से चर्चा की गई। अभिभावकों के भी सुझाव लिए गए। उसके बाद यह निर्णय किया गया।
इसके पहले भी किए हैं प्रयोग
छोटे बच्चों के गुणात्मक विकास को ध्यान में रखकर सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर कई बार प्रयोग किए गए। एक प्रयोग बच्चों को बैग फ्री करने का भी किया गया, लेकिन उससे लगा कि बच्चे जरूरी ज्ञान से वंचित हो सकते हैं और वे प्रतिस्पर्धा में भी पिछड सकते हैं। इसके कारण वह प्रयोग सफल नहीं हो सका। बीच में बच्चों का बोझ कम करने के लिए टर्म बुक का प्रयोग भी किया गया। यह भी कामयाब नहीं रहा।
ज्ञान और प्रतिस्पर्धा का संतुलन भी जरूरी
जहां तक बच्चों के पीठ पर बस्ते का बोझ का सवाल है तो बाल अधिकार आयोग और अन्य संस्थाओं के अनुसार बच्चे पर उसके वजन का 10 प्रतिशत से ज्यादा बोझ नहीं होना चाहिए। उक्त अनुशंसाओं के आधार पर यदि देखा जाए तो वर्तमान समय में यह बोझ कई बार अधिक हो जाता है। इस लिहाज से भी वजन कम होना चाहिए। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों और बढती प्रतिस्पर्धा के युग में इसका संतुलन भी बरकरार रखना जरूरी हो जाता है। स्थानीय स्तर से लेकर अंतरराष्टीय स्तर तक बच्चों को उनकी आयु और कक्षा के अनुसार ज्ञान से परिचित कराना भी जरूरी है। उक्त दोनों पक्षों को ध्यान में रखकर यह प्रयोग किया जा रहा है। हमारा ऐसा विश्वास है कि इससे जहां बच्चों को बोझ से राहत मिलेगी, वहीं वे न केवल राष्ट्रीय अपितु अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा के अनुपात में आवश्यक ज्ञान अर्जित कर सकेंगे।

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